Friday, July 3, 2020

संजीव गोयनका निकालेंगे फॉरच्यून


ऐसे समय में जब मडिया कारोबार का खराब समय चल रहा है, आरपी गोयनका समूह से अलग हुए आरपी-संजीव गोयनका समूह ने इस क्षेत्र में कदम बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की है और कहा है कि हम भारत में फॉरच्यून पत्रिका का प्रकाशन करेंगे. भारत में फॉरच्यून के प्रकाशन का लाइसेंस एबीपी ग्रुप के पास था, पर वह लाइसेंस अब खत्म हो चुका है. संजीव गोयनका ग्रुप का एकमात्र प्रकाशन अभी ओपन पत्रिका है. 7 जुलाई के बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित इंटरव्यू में इस ग्रुप के चेयरमान संजीव गोयनका ने भविष्य की अपनी योजनाओं का विवरण दिया है.



Thursday, July 2, 2020

मोदी के वीबो अकाउंट के खत्म होने की रोचक कहानी

PM मोदी का चीन को एक और जबरदस्त 'तमाचा ...

चीन में ट्विटर और फेसबुक वगैरह नहीं चलते हैं. वहाँ का वीबो प्लेटफॉर्म ट्विटर जैसा है. इस प्लेटफॉर्म पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हैंडल भी है. इसे अब खत्म कर दिया गया है. इसे खत्म करने के निहितार्थ अपनी जगह हैं, पर मुझे रोचक वह प्रक्रिया लगी, जो इस हैंडल से नाम वापसी में लगी. हिंदू में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार वीबो से हटने की प्रक्रिया बड़ी जटिल है. जब मोदी के हैंडल को खत्म करने की बात हुई, तो चीन ने दो दिन तक वह प्रक्रिया शुरू ही नहीं करने दी. वीबो पर नरेंद्र मोदी की 115 पोस्ट थीं. बाद में तय हुआ कि एक-एक करके पोस्ट हटाई जाएं. ऐसा करते हुए 113 पोस्ट तो डिलीट हो गईं, पर दो नहीं हुईं. वजह यह थी कि उनमें चीन के राष्ट्रपति की तस्वीर थी. वीबो में चीनी राष्ट्रपति वाली टिप्पणी को हटाना बेहद मुश्किल है. इस प्रकिया से जुड़े भारतीय अधिकारी ने हिंदू को बताया कि दो पोस्ट फिर भी हटाई नहीं जा सकीं।

Wednesday, June 18, 2014

रिपोर्टर के जीवन पर शेखर गुप्ता का आलेख

‘Our essential qualifications have changed… but a reporter’s life is more fun than before’
Shekhar Gupta | June 16, 2014 12:01 am
Shekhar GuptaShekhar Gupta

SUMMARY

Editor-in-chief Shekhar Gupta writes a farewell note to ‘The Indian Express’ newsroom
Shekar Gupta
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Baghdad needs external help to defeat ISIS. The next challenge will be to establish inclusive governance.
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Mani Shankar AiyarWed Jun 18 2014
Modi-Nawaz can take talks forward if they acknowledge progress made in 2004-07.
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C. Raja MohanWed Jun 18 2014
In politics, domestic or international, classical texts across civilisations caution against the idea that any two entities can be enemies for ever.
The president’s address itself says contained neither a roadmap nor details of this government’s priorities. “Good governance has many attributes.
I had promised to write specially to my fellow reporters. I am delivering on it now, sure enough, just before the deadline runs out. Which is so typical of us.
I had said also that I shall write this note even at the risk of being accused of crass tribalism. But it isn’t just that. In our more vain moments — which assail a reporter’s mind often — I have somewhat stupidly used the analogy of a typical Air Force to illustrate the unique mindset of the reporter: fighter pilot. All others are equally important and no Air Force will get airborne without them, but fighter pilots “are” the elite.
That era of those magnificent men (and women) with their typewriters is now over. And there is more to it than just the arrival of the drones.
It is because of the way journalism has changed. Our tools have become sharper, more powerful, our reach greater. At the same time, our audiences are better informed, more questioning and demanding. They demand quality, depth, trust and not just what our TV screens and news blogs call breaking news.
That is because breaking news, irrespective of who breaks it and where, takes a microsecond becoming common knowledge. In this hypersonic news environment, no exclusive survives. Not when every TV channel within minutes, and some newspapers the next day, begin to flaunt it as their own “exclusive”. As a reporter, I so often wish we could return to the old ways. Or that news-breaks could come with a TM attached!
But all is not lost. If you look closely, the news environment is more exciting than before. It calls for better skills, greater knowledge, more reliable sources, and that most valuable quality of all now: domain knowledge. It is no longer enough to get an exclusive sliver of a news-break. You need to back it with depth and knowledge, not within that particular story, but also with your track record on the subject. A reader will give you that extremely precious gift of time only if she is convinced you know what you are talking about.

पूरा लेख इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ें

Tuesday, April 24, 2012

अक्षय तृतीया पर हिन्दू का जैकेट


भारत के अखबारों के पास शानदार अतीत है और आज भी अनेक अखबार अपने पत्रकारीय कर्म का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें मैं हिन्दू को सबसे आगे रखता हूँ। पहले भी और आज भी। अखबार के सम्पादकीय दृष्टिकोण की बात छोड़ दें तो उसकी किसी बात से असहमति मुझे कभी नहीं हुई। हाल के वर्षों में बिन्दू व्यावसायिक दौड़ में भी शामिल हुआ है और बहुत से ऐसे काम कर रहा है, जो उसने दूसरे अखबारों की देखादेखी या व्यावसायिक दबाव में किए होंगे। पर ऐसा मैने नहीं देखा कि सम्पादक अपने अखबार की व्यावसायिक नीतियों और सम्पादकीय नीतियों के बरक्स अपनी राय पाठकों के सामने रखे। मीडिया ब्लॉग सैंस सैरिफ ने

अखबारों में जैकेट का चलन बढ़ता जा रहा है। एक शुरू करता है तो दूसरा चार जैकेट लगा देता है। बेशक इसमें पैसा मिलता है, पर शायद अब कोई सम्पादकीय विभाग अपने विज्ञापन विभाग से इस मामले पर दरियाफ्त करता हो। पर यह मसला जैकेट का नहीं, अखबार के विचार का है। इस सोमवार को हिन्दू के चेन्नई संस्करण में अक्षय तृतीया पर एक इन हाउस विज्ञापन जैकेट के रूप में छापा। इसका स्पष्टीकरण अखबार के सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन ने छापा है जो एक ओर पत्रकारिता की उस रेखा को स्पष्ट करता है, जिसका उल्लंघन लगातार हो रहा है। साथ ही अखबार की वैचारिक रेखा को व्यक्त करता है। बहरहाल उस संस्थान के भीतर क्या राय बनती है यह अलग बात है, पर इसे पारदर्शी तरीके से पाठक के सामने भी लाया जा सकता है यह बात महत्वपूर्ण है। इसे खुद पढ़ें। औरमीडिया ब्लॉग सैंस सैरिफ में यह रपट पढ़ें





इसके पहले 1 जनवरी 2012 के अंक में सोनिया गांधी की प्रशंसा में छपे जैकेट पर मिली प्रतिक्रियाओं के जवाब में सिद्धार्थ वरदराजन ने फेसबुक पर जो लिखा वह भी ध्यान देने लायक है।  पहले जैकेट को देखें उसके बाद नवागत सम्पादक की प्रतिक्रिया। इस विज्ञापन की सबसे जोरदार पंक्तियाँ हैं

 "We remain, Madamji, 
ever at your feet"




सिद्धार्थ वरदराजन ने तब अपने फेसबुक स्टेटस में लिखा था

“To all those who messaged me about the atrocious front page ad in The Hindu’s Delhi edition on Jan 1, my view as Editor is that this sort of crass commercialisation compromises the image and reputation of my newspaper. We are putting in place a policy to ensure the front page is not used for this sort of an ad again.”



हिन्दू के बारे में मेरी एक पुरानी पोस्ट पढ़ें